संपादकीय

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त्योहार विभिन्न वर्ग और मतावलंबियों में आपसी सौहार्द और भाईचारे को मजबूती देते हैं। ऐसा ही त्योहार है क्रिसमस या बड़ा दिन, जो प्रभु यीशु के आने की खुशी में मनाया जाता है। हालांकिह यीशु मसीह इस देश में पैदा नहीं हुए, ईसाईयत भारत का मूल धर्म भी नहीं है, फिर भी यह त्योहार यहां की सभ्यता और संस्कृति में घुल-मिल गया है। क्रिसमस का अर्थ मानव मुक्ति और समानता है। कितनी बड़ी बात है कि यीशु ने अपने मानव जन्म के लिए किसी का घर नहीं चुना, बल्कि एक गरीब की गौशाला में घासफूस पर जन्म लिया। वे इस संसार के गरीबों, भोले-भाले, ईश्वर का भय मानने वालों का उद्घार करने आए थे, इसलिए जन्म से ही विनम्रता रखी। यह बहुत बड़ा संदेश था गरीब और लाचार लोगों के लिए। 30 वर्ष की आयु में यीशु ने सामाजिक व्यवस्था के विरुद्ध अपनी आवाज बुलंद की। उन्होंने लोगों से कहा कि दीन-दुखियों और लाचारों की सहायता करो, प्रेम भाव से रहो, लालच मत करो, ईश्वर के प्रति कर्तव्यनिष्ठ रहो, जरूरतमंदों की जरूरत पूरी करो और आवश्यकता से ज्यादा धन संग्रह मत करो। क्रिसमस का सच्चा संदेश यही है कि जो साधन संपन्न हैं, उनका कर्तव्य है कि वे निर्धनों और कमजोरों की यथासंभव सहायता करें। उनकी खुशी व्यर्थ है, यदि उनके सामने कोई कमजोर और निर्धन है, जिसके पास अपनी जरूरतें पूरी करने की भी शक्ति नहीं है, जबकि उन्होंने अपने लिए ऐश्वर्य के बहुत से साधन जुटा लिए हैं। इसीलिपए दूसरे धर्म के लोग भी इस त्योहार को उतने ही उत्साह से मनाते हैं। क्रिसमस के अवसर पर एक दूसरे को गिफ्ट देते हैं और बच्चों को सांता क्लाज का बेसब्री से इंतजार रहता है। इस त्योहार पर क्रिसमस ट्री का भी खास महत्व है। यही कारण है कि ईसाई परिवार अपने घरों में क्रिसमस ट्री सजाते हैं। इसके बिना क्रिसमस का त्योहार अधूरा रहता है। क्रिसमस के मौके पर चर्च को भी दुल्हन की तरह सजाया जाता है। जहां बिशप और पादरी प्रवचन देते हैं और उन्हें सुनने के लिए भारी भीड़ जमा होती है। लेकिहन जिस यीशु का वे लोग जन्मदिन मना रहे होते हैं, उसे चर्चा के बाहर ही खड़ा कर देते हैं। सही मायनों में क्रिसमस की खुशियां तभी हैं, जब आप इस आयोजन में उन लाचार, मजबूर और बेबस लोगों को भी सम्मिलित करें, जो इसमें शामिल होने की हैसियत नहीं रखते। फिर इसी के साथ नए साल का भी आगाज हो जाता है। ऐसे में उनका भी नया साल आनंददायक हो, यह सुनिश्चिेत करने की जिम्मेदारी सिर्फ ईसाई बिरादरी ही नहीं, हम सबकी है।